Monday, September 14, 2020
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नित्या मोहन कैंसर इम्यूनोथैरेपी में पीएचडी कर रही हैं

रिसर्च स्कॉलर नित्या मोहन जब मात्र सात साल की थीं, तब उन्हें कैंसर  का सामना करना पड़ा।

लेकिन समय पर इलाज, परिवार के सहयोग और खुद के हौसले ने कैंसर को हरा दिया। इतनी कम उम्र में कैंसर का मतलब एक छोटे बच्चे की समझ से परे था।

लेकिन कैंसर के इलाज के दौरान की यादें नित्या के मन में इतनी गहराई तक समाईं कि बड़े होने पर भी उनके मन में कई सवाल उठते रहे, जैसे आखिर यह कैंसर है क्या? इसका कारण क्या होता है? क्या कोई ऐसी वैक्सीन नहीं है, जो कैंसर को होने से रोक सके? और इन्हीं सवालों के जवाब ढूंढने के लिए उन्होंने कैंसर पर रिसर्च करने का निश्चय किया।

उनका वह इरादा इतना प्रबल था कि उसे हकीकत में बदलना ही पड़ा।वर्ष 2016 में उनका चयन जर्मन कैंसर रिसर्च सेंटर, हाइडलबर्ग, जर्मनी के लिए हो गया। जहां से इस समय वे कैंसर इम्यूनोथैरेपी में पीएचडी कर रही हैं। 

कैंसर के इलाज के चलते नित्या को करीब आठ महीनों तक स्कूल से दूर रहना पड़ा, बावजूद इसके उन्होंने अपनी एकेडमिक परफोर्मेंस पर इसका कोई असर नहीं पड़ने दिया। स्कूल में टॉप-5 में आती रहीं। वर्ष 2011 में डिपार्टमेंट ऑफ बायोकैमिस्ट्री,पंजाब यूनीवर्सिटी से बायोकैमिस्ट्री में ग्रेजुएशन किया, जिसमें डिपार्टमेंट में सर्वश्रेष्ठ अंक प्राप्त करने पर उन्हें स्वर्ण पदक से नवाजा गया। वर्ष 2014 में उनका चयन टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, मुंबई के लिए हो गया जहां से उन्होंने रिसर्च के साथ मॉलीक्यूल बायोलॉजी में एमएससी किया।

नित्या कहती हैं, "जब मैं एम एस सी कर रही थी तब मैंने पढ़ा था कि हमारा इम्यून सिस्मट कैसे कैंसर के इलाज में मदद कर सकता है। इससे मैं इतनी अधिक प्रभावित हुई कि उसी समय मैंने इस विषय पर पीएचडी करने का मन बना लिया। इस समय हमारी टीम थैरोप्यूटिक वैक्सीन को अधिक प्रभावी बनाने और आम लोगों की पहुंच तक लाने  दिशा में काम कर रही है। दरअसल थैरोप्यूटिक वैक्सीन शरीर के इम्यून सिस्टम को मजबूत करने का काम करती है, और यदि शरीर के कोई सेल ह्यूमन पेपीलोमा वायरस (HPV) से प्रभावित होते हैं, तो उन्हें कैंसर सेल में बदलने से पहले ही खत्म करने में मदद करती है। इसके अलावा हम विटामिन्स, मिनिरल्स, एंटीऑक्सिडेंट से भरपूर खाना खाकर और खुद को शारीरिक रूप से सक्रिय रखकर भी अपने इम्यून सिस्टम को कैंसर सेल को मारने की ताकत दे सकते हैं।"   

नित्या आगे कहती हैं, "इलाज के दौरान जो प्यार मुझे उन डॉक्टर्स, टीचर्स, मेरे परिवार और दोस्तों से मिला, उसने मुझे समाज के लिए कुछ करने को प्रेरित किया। आज मुझे यह अवसर मिला है कि इस वैक्सीन के रूप में मैं भी समाज को कुछ दे सकूं।"

वर्ष 1996 की बात है, जब नित्या का परिवार दिल्ली में रहा करता था और वे रायन इंटरनेशनल स्कूल में क्लास-3 की स्टूडेंट थीं।

नित्या पेरेंट्स से अकसर सीधे पैर में दर्द की शिकायत किया करतीं। बेटी को बार-बार इस तरह दर्द से परेशान देखकर एक दिन उनके पेरेंट्स उन्हें ऑर्थोपेडिक्स के पास ले गए। चेकअप के बाद डॉक्टर ने कुछ दवाइयां दीं और इसे सामान्य दर्द बताया।

इलाज के दौरान जो प्यार मुझे उन डॉक्टर्स, टीचर्स, मेरे परिवार और दोस्तों से मिला, उसने मुझे समाज के लिए कुछ करने को प्रेरित किया। आज मुझे यह अवसर मिला है कि इस वैक्सीन के रूप में मैं भी समाज को कुछ दे सकूं

लेकिन उन दवा से भी जब दर्द में कोई आराम नहीं आया तो उन्हें दूसरे ऑर्थोपेडिक्स के पास ले जाया गया, जिन्होंने पैर का एमआरआई कराने को कहा।

एमआरआई की रिपोर्ट देखने के बाद डॉक्टर को कुछ ठीक नहीं लगा, इसलिए उन्होंने कुछ दिनों के लिए दवाइयां दीं और दवा से भी दर्द कम न होने पर पैर की सर्जरी करने को कहा।

जब उन दवाओं का भी दर्द पर कोई असर नहीं हुआ तो आखिरकार डॉक्टरों को उनके पैर की सर्जरी करनी पड़ी ताकि इस असहनीय दर्द का कारण जाना जा सके। तब परीक्षण में नित्या को एक्यूट लिम्फोसिटिक ल्यूकोमिया। (ब्लड कैंसर) होने की पुष्टि हुई।

‘इतने छोटे बच्चे को कैंसर होने की बात सुनकर हम सब घबरा गए। इस बारे में हमने दिल्ली के बहुत से डॉक्टरों से बात की और बीमारी के बारे में पढ़ना शुरू किया। तब हमें पता चला कि यह कैंसर बच्चों में बहुत ही सामान्य है। साथ ही यह भी मालूम चला कि यह पूरी तरह ठीक हो सकता है। यह हमारे लिए कुछ सुकून की बात थी, लेकिन फिर भी मन में चिंता तो थी ही’। यह कहना है नित्या के पिता अमिताभ मोहन का।

आखिरकार ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस, (एम्स) नई दिल्ली में नित्या का इलाज शुरू हुआ। हॉस्पिटल का माहौल बहुत ही सकारात्मक हुआ करता था। वहां के डॉक्टर्स, नर्सेस और कैंसर पेशेंट्स की मदद के लिए काम कर रही संस्था के लोग सकारात्मक बातों से उनका हौसला बढ़ाया करते।

अमिताभ मोहन कहते हैं, ‘मैं एम्स, नई दिल्ली, पीजीआई, चंडीगढ़, के उन डॉक्टर्स और कैंसर पेशेंट्स की मदद के लिए काम कर रहीं संस्थाओं, ‘सहयोग’ और ‘सहायता’ का हमेशा ऋणी रहूंगा, जिन्होंने उस कठिन समय में हमारा हौसला बढ़ाया। ‘सहयोग’ संस्था के लोग हमें बहुत से उन लोगों को मिलवाते थे, जिन्होंने कई साल पहले कैंसर को हराया था और आज वे सामान्य जिंदगी जी रहे हैं। उनसे मिल कर हमारा आत्मबल बढ़ता और मन में एक भरोसा होता था कि हमारी बेटी भी ठीक होकर एक दिन इन्हीं की तरह सामान्य जिंदगी जी सकेगी। हॉस्पिटल में डॉक्टर्स और नर्सेस नित्या को कहानियां और चुटकुले सुना कर हमेशा खुश रखा करते थे।"

एक सात साल के बच्चे के लिए कीमोथैरेपी और उसके साइड इफेक्ट को सहन करना बहुत अच्छे पल नहीं हुआ करते थे।इसलिए हॉस्पिटल विजिट को पिकनिक ट्रिप बनाया जाता था

कीमोथैरेपी के बाद नित्या को कुछ दिनों के लिए डॉक्टर हॉस्पिटल में ही अपनी निगरानी में रखा करते थे। उस दौरान खुद को व्यस्त रखने के लिए वे कहानियों की किताबें पढ़ा करतीं डॉक्टर्स और नर्सेस से बातें करतीं, उनसे अपनी बीमारी के बारे में सवाल करतीं। 

"मेरी बीमारी से संबंधित सवालों के जवाब डॉक्टर्स इतने खूबसूरत तरीके से दिया करते थे कि वे आज भी मेरे जहन में तरोताजा हैं। वे कहते थे, 'तुम्हारा शरीर एक गार्डन है, जिसमें कुछ गंदगी जमा हो गई है। हम इलाज से गार्डन की सारी गंदगी को निकाल देंगे और फाइनल बोनमैरो टेस्ट से इस गार्डन के गेट पर ताला लगा देंगे, ताकि फिर से बेकार की चीजें अंदर न जा सकें।' उस समय अपनी बीमारी को समझने का इससे आसान उदाहरण मेरे लिए शायद ही हो सकता था," यह कहना है नित्या का।

नित्या मोहन प्रकृति का आनंद लेती हुई

एक सात साल के बच्चे के लिए कीमोथैरेपी और उसके साइड इफेक्ट को सहन करना बहुत अच्छे पल नहीं हुआ करते थे।इसलिए हॉस्पिटल विजिट को पिकनिक ट्रिप बनाया जाता था।

घर से खाना बना कर ले जाना, उसे हॉस्पिटल के गार्डन में बैठकर खाना। नित्या की बड़ी बहन का उनके साथ तरह-तरह के खेल खेलना और उसके सबसे पंसदीदा डहेलिया के फूलों के साथ फोटो खींचना, यह सब उस पिकनिक ट्रिप का हिस्सा हुआ करते थे।

आठ महीनों के लंबे इलाज के बाद उनकी बीमारी में सुधार होने लगा। लेकिन करीब एक साल तक दवा चलती रही।

जल्दी ही नित्या ने स्कूल जाना शुरू कर दिया। उन दिनों को याद करते हुए वे कहती हैं, ‘मुझे याद है, जब इलाज पूरा होने के बाद मैंने स्कूल जॉइन किया, तब कैसे गर्मजोशी के साथ मेरी प्रिंसीपल, टीचर्स और मेरे दोस्तों ने मेरा स्वागत किया। जब टीचर्स मुझे साहसिक बच्चा कहतीं थीं, तो उनके यह शब्द बीमारी के बाद मुझमें जोश भरने के लिए टॉनिक का काम करते थे। आज मैं जो कुछ भी हूं, उसका श्रैय मैं अपने परिवार के साथ-साथ मेरे दोस्तों, टीचर्स और उन डॉक्टर्स को देना चाहूंगी, जिन्होंने इलाज के दौरान और उसके बाद मुझे खुद को कभी कमजोर महसूस नहीं होने दिया।"

वर्ष 1999 में उनके पिता का चंडीगढ़ ट्रांसफर हो गया। नित्या का चंडीगढ़ के विवेक हाई स्कूल में दाखिला करा दिया गया और उनका रूटीन चेकअप पीजीआई में होने लगा।

इस बीच घर में सब कुछ सामान्य होने लगा। स्कूल की पढ़ाई के बाद कॉलेज और फिर रिसर्च के लिए नित्या जर्मनी चलीं गईं। इस समय नित्या पूरी तरह स्वस्थ हैं और अपने रिसर्च कार्य में व्यस्त हैं।

लेकिन कैंसर को लेकर जो भ्रांतियां समाज में फैलीं हैं, उनको लेकर उनके मन में गुस्सा है और वे चाहती हैं कि इस बारे में सही जानकारी लोगों तक पहुंचनी चाहिए।   

धारणा है कि

  •  अगर किसी को एक बार कैंसर हो गया तो ठीक होने के बाद भी दूसरी, तीसरी बार कभी भी हो सकता है।
  • किसी को अगर बचपन में कैंसर हुआ है तो शादी के बाद उसके बच्चों में कैंसर होने की संभावना बहुत ज्यादा होती है।
  • एक बार कैंसर होने के बाद ठीक होने पर भी वह व्यक्ति सामान्य जिंदगी नहीं जी सकता।  
  • एक रिसर्च स्कॉलर होने के नाते नित्या इन सब धारणाओं को सिरे से खारिज करती हैं।

वे कहती हैं, ‘यह सब हमारी कैंसर के बारे में जागरुकता की कमी का परिणाम है। जबकि सच्चाई यह है कि केवल कुछ ही तरह के कैंसर हैं जो कि एक बार ठीक होने के बाद दोबारा वापस आते हैं। बल्कि मैं तो कहूंगी कि कैंसर सर्वाइवर्स तो दोबारा कैंसर होने की सबसे कम रिस्क में होते हैं, क्योंकि वे अपने खान-पान और हेल्थ चेकअप को आम लोगों की अपेक्षा ज्यादा गंभीरता से लेते हैं।

कैंसर को लेकर जो भ्रांतियां समाज में फैलीं हैं, उनको लेकर उनके मन में गुस्सा है और वे चाहती हैं कि इस बारे में सही जानकारी लोगों तक पहुंचनी चाहिए

दूसरी धारणा भी पूरी तरह निराधार है। बहुत कम ऐसे कैंसर हैं, जो एक पीढ़ी से दूसरे में जाते हैं। चूंकि कैंसर सर्वाइवर्स इस बारे में जागरूक और सचेत होते हैं, इसलिए इसकी संभावना उनमें न के बराबर होती है।

 तीसरी धारणा के बारे में तो ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं है, इस बारे में आप मेरा और मेरे जैसे बहुत से लोगों का उदाहरण ले सकते हैं, जो कि बिना किसी परेशानी के हैप्पी और हेल्दी लाइफ जी रहे हैं’।

वंदना गुप्ता स्वतंत्र पत्रकार हैं और 'मेरा सृजन' नाम से ब्लॉग चलाती हैं। यह लेख वहीं से साभार