Wednesday, September 25, 2019
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क्या सच में किसानों का लालच हाथियों के घटते रहवास के लिए जिम्मेदार है? Source: Need Pix.com

सामाजिक कार्यकर्ता ईशान अग्रवाल बात कर रहे हैं किसानो और जंगली जानवरों की, जंगल की और पूँजीवाद की

आज बच्चों के साथ बैठा नेशनल जियोग्राफिक चैनल देख रहा था।  भारत के पूर्वोत्तर के जंगलों पर सुन्दर वृत्तचित्र था वह।उत्तंग हिमालय से शुरू करके ब्रह्मपुत्र के विशाल फाट तक अचंभित कर देने वाले दृश्य। गोल्डन लंगूर, रेड पांडा, एशियाई काला भालू और न जाने क्या क्या।

पर जैसे ही कहानी मनुष्य-जानवर द्वन्द पर उतरी, मुझे बड़ा दुःख हुआ। उसमें हाथियों के घटते रहवास को लेकर चिंता प्रकट की जा रही थी।  कहा जा रहा था के पूर्वोत्तर में जनसँख्या और खेती के लिए जमीन का लालच बढ़ रहा है। और इस लालच से हमारे हाथियों के लिए रहवास कम रह गया है।

क्या सच में किसानों का लालच हाथियों के घटते रहवास के लिए जिम्मेदार है?

इस बात को इस तरह से पेश किया जाता है जैसे यह कोई ब्रह्म-वाक्य हो, के भैया ! यही सच है.. जान लेयो। और बाकी सब है मिथ्या। हमारी पहले से ही मूर्ख बनी मध्य-वर्गीय दुनिया को और मूर्ख बनाते रहने की साजिश है ये। मैं उत्तराखंड का रहने वाला हूँ। हमारे यहाँ भी जंगल थोक के भाव है। वहां भी यही घिसी पिटी कहानी कई दशकों से लोग सुनाये जा रहे हैं। कर्मभूमि है मंडला, मध्य प्रदेश। तो यहां भी वही राग है। के भैया, जे किसान, ट्राइबल सब लालची लोग हैं। इन्होने हमारे निरीह वन्य प्राणियों की जमीन उनसे छीन ली है।  कुछ लोगों का मत इसमें तटस्थ बनने की कोशिश में और खतरनाक हो जाता है।  जैसे, भई अब उनको भी तो अपना "लाइवलीहुड " चलाना है। उनको रोजगार की जरूरत है। अगर दे दोगे तो खेती नहीं करेंगे।  ध्यान से देखिये तो इसका क्या मतलब निकलता है? गाँव के लोगों को शहर का बेगार बना दो। जमीन पे कब्ज़ा करो, और उसे जंगल बना दो।  किसी तरह लोगों को जंगल से दूर रखो।

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थोड़ा इतिहास पर गौर करें तो मनुष्य जानवर द्वन्द की असली वजहें सामने आएँगी। मसलन, हमें दिखाई देंगे, 19 वीं सदी में जंगल काटकर बनाये गए  चाय के बागान। देखने में बड़े सुन्दर लगते हैं। पर क्या हमने हाथी को कभी चाय के पत्ते खाते देखा है ? त्रिपुरा के खेतों में रबर की खेती कैसे पहुंची? आपने कभी रबर का पेड़ देखा है, एक दम हरा भरा रहता है। बहुत पानी चाहिए होता है उसे। किसी हाथी को उसे खाते देखा? अरुणाचल के प्लाईवुड उद्योग की कहानी मालूम है आपको? लाखों एकड़ जंगल का दोहन करके यह उद्योग बना था। कुछ समय पहले अरुणाचल में पेड़ काटने पर रोक के चलते इस उद्योग पर थोड़ा अंकुश लगा। क्या इन सब तथ्यों में मनुष्य-और आदमी की जंग का कारण नहीं ढूंढना चाहिए। जिसे देखो किसानों को उपदेश देने में लगा है।

ये सच है कि जंगल साफ़ करके खेत बनाने की प्रवत्ति किसानों में बहुत पुरानी है। आदमी और जानवरों की लड़ाई भी बहुत पुरानी है। लेकिन इस सब में हम ये भूल जाते हैं कि बहुतायत भारतीय किसान अपने उत्पादन का अधिकतर हिस्सा घरेलू जरूरतों के लिए इस्तेमाल करते हैं। लेकिन औपनिवेशिक काल के ये उद्योग किसकी भूख को ध्यान में रख कर बनाये गए थे, क्या इसमें हमें कोई हिस्ट्री क्लास चाहिए? जिस औद्योगिक नीति से औपनिवेशिक काल में अंग्रेज़ों ने हमारे संसाधनों का शोषण किया, उसका असर अब तक ख़त्म होना तो दूर, बढ़ ही रहा है।

मान लीजिये आप एक वनवासी हैं, और सरकार आपके जंगल में ऐसा एक पेड़ लगा देती है, जिसका इस्तेमाल आपको पता ही नहीं। और एक नहीं, करोड़ों पेड़ लगा देती है। ऐसे में क्या होगा? आप जिस तरह से जंगल का इस्तेमाल करते थे, उसमें परिवर्तन आएगा। 200 सालों से हमारी सरकार यही  कर रही है। हमारे जंगलों को विदेशी मेहमानों से भर दिया गया है। सागौन, यूकेलिप्टस, चीड़, विलायती बबूल, सब विदेशी हैं। और देशी पौधों और पेड़ों से हमारे नए औपनिवेशिक साहबों को जबरदस्त परेशानी है। उनकी सबसे बड़ी परेशानी है कि इनका तो लोग इस्तेमाल करते हैं, तो इन्हें लगाने से प्लांटेशन का परिणाम अच्छा नहीं होगा। लोगों और जंगल के रिश्ते को कमज़ोर बनाना ऐसे लोगों का परम ध्येय है।

जब मंडला में 40 से 50 प्रतिशत वनभूमि पर सागौन होगा, जब हिमाचल और उत्तराखंड में 60% भूमि पर चीड़ होगा, तो मवेशी कहाँ चरने जाएंगे? जब राजस्थान के शामलात और गुजरात के बन्नी चारागाह विलायती बबूल से भर जाएंगे, तो हमारे मवेशी चरने कहाँ जायेंगे। कैसे बहेंगी इस देश में दूध की नदियां ? कैसे मिलेगा, गरीब के बच्चे को पोषण? जिस देशी गाय के दूध की तासीर को लेके आज दुनिया भर में सरकार रिसर्च करा रही है, उसे ये नहीं दिखाई देता कि देशी गाय चरने कहाँ जाती थी, उसका चरोगन बचा है के नहीं? दूध की तासीर इस बात पर निर्भर है कि जिस चारे से दूध में वह तासीर आती है, वह अब गाय को मिल रहा है या नहीं। मिल रहा है क्या?

अब तो बचा कुचा जंगल भी लील लिए है विदेशी आक्रमणकारी। हैरान मत होइए, जिनके बारे में बात कर रहा हूँ, उनके लिए वैज्ञानिक शब्द भी कुछ ऐसा ही है- Invasive species यानी आक्रामक प्रजातियां। ये अपने आसपास किसी को पनपने नहीं देतीं और दूसरे पौधों को मार भी देती हैं। इन्हें शायद आप पहचानते भी होंगे। इसमें प्रमुख हैं लैंटाना, गाजर घास, ममरी, काला बासिंगा वगैरह। अब जो थोड़ा बहुत बचा है उसके लिए लड़ाई है।आपको हैरानी होगी, कि ये आक्रमणकारी हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को 6.37 लाख करोड़ रूपए का नुकसान करते हैं। क्या हुआ, आँखें अपने फर्मे से बाहर निकल आयीं?  आँखों के साथ साथ जबान बाहर लाने के लिए यह बता दूँ के ये आंकड़ा 2001 के अनुमान के अनुसार है, जोकि कहा गया है, कि काफी "कंज़र्वेटिव " है। ये आंकड़ा मेरा नहीं है। अंकिला हीरेमथ और सिद्धार्थ  का है। जानकारी के लिए पढ़िए-
India Knows Its Invasive Species Problem But This Is Why Nobody Can Deal With it Properly

और ऐसे में हम कहते हैं के किसान लालची हो गए हैं? हम आह भी लेते हैं तो हो जाते हैं बदनाम, वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता।

अधिक जानकारी के लिए नीचे लिखी किताब भी पढ़ सकते हैं-

Ecological imperialism - अल्फ्रेड क्रॉस्बी

एक किताब काफी है, ज्यादा किताब पढ़ने से किताबी हैजा होने का डर है। अपने आसपास देखिये, गाँव वालों से बात कीजिये, ज्यादा समझ में आएगा।

ईशान अग्रवाल मध्य प्रदेश में सामाजिक कार्यकर्ता हैं और अपने blog 'मैं कबीर' पर गहरायी में लिखते हैं। यह लेख वहीं से साभार।  

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