Tuesday, March 10, 2015
|
 बहुत सी परंपरागत फसलें बीमारी से निजात पाने में मददगार होती हैं, जिन्हें प्रतिकूल परिस्थितियों में उगाया जा सकता है।

एक छोटा सा बीज आपसे क्या कह सकता है? बहुत कुछ, यह कहते हैं स्वदेशी बीजों को बचा कर रखने वाले लोग जो कि इसे सांस्कृतिक और राजनीतिक एकाधिकार के खिलाफ चुनौती के रूप में देख रहे हैं

आलू जो कि बेल पर उगता है,  चावल को पानी में भिगोने के बाद कच्चा खाया जा सकता है, दलिया (फटा गेंहू) प्राकृतिक रूप से मीठा होता है। यह सब सुनने में भले ही अटपटा लगे। लेकिन हमारे किसान सदियों से यह सब उगाते आ रहे हैं। इनके अलावा, ऐसी बहुत सी फसलें हैं जो कि खासतौर पर बीमारी से निजात पाने में मदद करती हैं और जिन्हें प्रतिकूल परिस्थितियों में उगाया जा सकता है।

लाल चावल के बारे में आप क्या कहेंगे जिसे इसकी पौष्टिकता के चलते खासतौर पर गर्भवती महिलाओं के लिए पकाया जाता है? या धान जिसे सुंदरबन के खारे पानी में उगाया जा सकता है?  इनके बारे में हम इसलिए कम जानते हैं, क्योंकि हाइब्रिड बीजों के उदय ने परंपरागत बीजों को हाशिए पर रख दिया है, जिनको निजी कंपनियों ने बढ़ावा दिया और नीति निर्माताओं ने स्वागत किया। लेकिन बाजार से ज्यादा, यह हमारे उगाने और  खाने  के चुनाव के अधिकार पर चोट करता है। 

किसकी संपदा, किसकी बौद्धिकता? 

हाइब्रिड बीज मौटे तौर पर ज्यादा पैदावार को ध्यान में रखते हुए विकसित किए गए, लिहाजा खाद्य फसलों में पोषक गुणों की उपेक्षा की गई। पारंपरिक तौर पर, बीजों को बचा कर रखा और पड़ोसियों को बांटा जा सकता था। किसाना बीजों को कभी कभी ही खरीदते थे। लेकिन आजकल, किसान इस तरह की ‘गुणवत्ता’ वाली हाइब्रिड किस्म को नहीं उगा सकते क्योंकि वे इस तरह से डिजाइन किए गए हैं जो कि केवल एक पीढ़ी के लिए अच्छी पैदावार देते हैं। इन्हें हर साल व्यापारियों से खरीदना पड़ता है। इसके परिणामस्वरूप, किसान, जो कि बीजों का निर्माता था, पेटेंट लाइसेंस लगाए जाने के चलते अब उन्हें निजी कंपनियों की मर्जी पर निर्भर होना पड़ रहा है।  जिसका परिणाम, हमारा खाना महंगा होना है।        

अगर हम मानते हैं कि बीजों का संकरण पहले से उपलब्ध बीजों में नई किस्म जोड़ने के लिए किया गया है, जिन्हें किसानों ने संशोधित और संरक्षित किया, ऐसे में बौद्धिक संपदा अधिकार का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। ओड़िशा की एक किसान और बीज संरक्षक साबरमती मानती हैं कि कुछ हाइब्रिड बीजों का प्रचार करना खेती के व्यवसाय का एकाधिकारीकरण करना है। वे कहती हैं कि ‘किसान बीजों को केवल अच्छी पैदावार के लिए संरक्षित करके नहीं रखते, बल्कि बाढ़ प्रतिरोधक, सूखा प्रतिरोधक और खुशबूदार होने जैसे गुणों के चलते इन्हें संरक्षित करते थे।  वे कहते हैं, कुछ हाइब्रिड बीजों का एकाधिकारीकरण हमारे उगाने और जो हम खाना चाहते हैं उस चुनाव को कम करता है’। 

बीज संस्कृति को कैसे दर्शाता है

अगर हाइब्रिड बीज  विशेष नियंत्रण और विदेशी संस्कृति को प्रकट करता है, तो परंपरागत बीज की किस्में स्थानीय और लोक संस्कृति की भावना को दर्शाता हैं। पश्चिम ओड़िशा कृषक संगठन के सरोज का मानना है कि विदेशी धरती से बीजों का आना ही राजनीतिक परिवर्तन का पहला सूचक है। 

उनका कहना है कि “बीज हमारी संस्कृति, स्वास्थ्य, सामाजिक और राष्ट्रीय सार्वभौमिकता से संबंधित है। अगर हमने बीज की सार्वभौमिकता को खो दिया तो मतलब इन सभी अधिकारों को भी खो दिया। दक्षिण और पश्चिम ओड़िशा में प्रवासियों ने 1960 के दशक में मकई उगानी शुरू की और धीरे-धीरे भूमि स्वामित्व आदिवासी हाथों से प्रवासियों के हाथों में चला गया। जो धरती स्थानीय जरूरत के हिसाब से बाजरा, दालें और तिलहन उगाती रही, अब मकई को निर्यात कर रही है।”     

यह दर्शाता है कि, हाइब्रिड बीजों के आने से हमारे परंपरागत और राजनीतिक अधिकार कंपनियों के पास चले गए हैं। सरोज कहते हैं कि “ दुर्भाग्य से, इस व्यवस्था को हमारे ही किसान भाईयों और गैर सरकारी संस्थाओं ने हरित क्रांति के समय हाइब्रिड बीजों को प्रयोग करके और उन्हें प्रचारित करके बढ़ावा दिया था”।  

तो आगे क्या ? 

सामुदायिक संस्थाएं जैसे ‘सहज समरुद्ध’ और ‘सेव अवर राइस कैंपेन’, ‘बीज बचाओआंदोलन’ जैसे आंदोलन और कुछ दूसरे भी स्थानीय स्तर पर पैदा किए गए बीजों को संरक्षित और प्रचारित करते आ रहे हैं। इसके अलावा, कुछ दूसरे किसान व्यक्तिगत तौर पर समान उद्देश्य के लिए काम कर रहे हैं। ऑरोविल से एक किसान, दीपिका कुंडाजी, भारत  की अलग-अलग जगहों से लाए गए सब्जियों के करीब 90 स्वदेशी बीजों को एक छोटे से 0.25 एकड़ के फार्म पर सुरक्षित रखती हैं।  वे कहती हैं “यह वो किस्में हैं जो कि विलुप्त होती जा रही हैं, यह आपको सब्जी मंडी में नहीं मिलेगी इसीलिए इन्हें संरक्षित करने की जरूरत है। हालांकि सब्जियों में क्रॉस पॉलीनेशन होने में बहुत परेशानी आती है, यही कारण है कि ज्यादातर लोग सब्जियों का काम नहीं करते। 

इस तरह की तकनीकी चुनौतियों से निपटने और बीजों के संरक्षण व सामुदायिक हिस्सेदारी को बढ़ाने के लिए, पिछले साल भारत बीज स्वराज मंच जैसा स्वतंत्र बीज संरक्षक तंत्र स्थापित किया गया, जिसे भारत बीज सार्वभौमिक गठबंधन भी कहा जाता है। यह तंत्र बौद्धिक क्षमता बढ़ाने के लिए भारत के अलग-अलग हिस्सों में कार्यशालाओं के द्वारा व्यक्तिगत बीज संरक्षकों के प्रयासों को एकीकृत करने और बीजों की किस्मों की शुद्धता से संबंधित मुद्दों से निपटने पर ध्यान केंद्रित करेगा। 

साबरमती मानती हैं कि किसानों के अलावा दूसरे लोग भी कुछ स्वदेशी बीजों को अपनाकर इन प्रयासों में अपना योगदान दे सकते हैं। वे कहती हैं “यहां तक की आप प्लैट में रह कर भी कुछ पौधे जैसे मिर्च को गमलें में लगा सकते हैं। जिसका उपयोग आप अपने खाने में कर सकते हैं और बीजों को आगे बांट भी सकते हैं। यह मुश्किल काम नहीं है। और जिम्मेदारी को साझा करके, हम कई लाखों स्वदेशी बीजों को संरक्षित करने से बच सकते हैं”। 

संपादन ः वंदना गुप्ता 

अगर आपको यह लेख पसंद आया तो हमारे कार्य को अपना समर्थन दें

Add new comment