Thursday, June 30, 2016
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एक मन्दिर और छोटा सा सरोवर नांडूवाली नदी के उद्गम स्थल को चिन्हित करते हैं.

पूरी तरह सूख चुकी नांडूवाली नदी का फिर से बहना अकाल ग्रस्त भारत के लिए एक सुखद  संदेश है

राजस्थान के अलवर जिले के घेवर गांव में रहने वाले गजानंद शर्मा, इस साल होने वाले मानसून को लेकर बहुत उतावले हैं। वह एक छोटे से नाले पर एनीकट बना रहे हैं जो कि उनके खेतों से होकर बहता है। वे भविष्यवाणी करते हैं: "बारिश के बाद यह जमीन पानी से भर जाएगी और तब मैं इसमें गेहूं बोऊंगा और इस क्षेत्र का रिकॉर्ड उत्पादन लूंगा," यह पूर्वानुमान वे अपनी ज्योतिषशास्त्र की जानकारी के द्वारा नहीं बल्कि इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति के आधार पर कर रहे हैं जिसे कि उन्होंने वर्षों से जाना है।

दरअसल एनीकट एक छोटे से बांध का काम करता है। अतिरिक्त पानी दीवार के ऊपर से निकल जाता है जबकि जिसे रोका जा सकता है वह पानी धीरे-धीरे रिसता हुआ जमीन में जाकर भू-जल स्तर को बढ़ा देता है और सूखे कूओं को फिर से सजीव करता है। यह पानी गाद भी लेकर आता है जो कि जमीन को उपजाऊ बनाता है। इस बरसात में गजानंद शर्मा का खेत इस नज़ारे का गवाह होगा। इस एनिकट से आसपास  के दर्जन भर कुँए भी रिचार्ज होंगे जिस वजह से पडोस के किसान भी इस काम में श्रम और राशी का सहयोग दे रहे हैं।  

 

गजानंद शर्मा अपने खेत में एनिकट बनाते हुए.

 

इस क्षेत्र में बहुत से एनीकट, जोहड़ (तालाब), मेड़बंदी और समृद्ध जंगल हैं जिनसे 160 कि. मी के दायरे में फैले 20 गाँव पानी के मामले में समृद्ध हैं. प्राकृतिक समृधि का सबसे बड़ा संकेत है नांडूवाली नदी जो कई गांवों के कुओं और खलिहानों को जीवन दे रही है।

सूख चुके थे खेत खलिहान

यह कल्पना करना मुश्किल है कि एक समय था जब यह नदी और जंगल सूख चुके थे। कुओं में कटीली झाड़ियां उग आई थी। बरसात के पानी से जो थोड़ी बहुत फसल होती थी, उसमें लोगों को गुज़ारा करना मुश्किल हो रहा था।  पैसों की कमी के चलते लोगों को गाय भैंस का चारा खरीदना भारी पड़ रहा था, इसीलिए वे उन्हें बेच कर बकरियां रखने लगे। वहीं रोज़ी रोटी के लिए लोगों को मजबूरन यहां से पलायन करना पड़ रहा था। लेकिन आज यह इलाका न केवल प्राकृतिक रूप से समृद्ध है बल्कि आर्थिक रूप से भी संपन्न हो चुका है। आज यहां सब्जियों के खेत लहलहा रहे हैं, कदम, ढोंक और खेजड़ी की शाखाएं फूलों और पत्तियों से लदी हैं।  पिछले दो वर्षों में कम बरसात के बावजूद आज कुओं में पानी 40-50 फीट पर उपलब्ध है। 

रंग लाई दो भाईयों की मेहनत

यह सब संभव हुआ जंगल, जोहड़ और मेड़बंदी से। इसी इलाके के नांडू गाँव के दो भाइयों, कुंज बिहारी और सतीश कुमार, ने इस अभियान का बीड़ा उठाया। लेकिन इस नेक काम को करने की उनकी यह राह आसान नहीं थी। समाज और पारंपरिक ज्ञान की कमी के अलावा लोगों को स्वावलंबी बनाने जैसी चुनौती भी उनके सामने थी। कुंज बिहारी कहते हैं कि ‘एक स्थानीय होने के बावजूद लोगों का विश्वास हासिल करने में उन्हें एक साल लग गया’। सभी जातियों को साथ लेकर चलना बहुत मुश्किल काम था। लेकिन धीरे-धीरे उनका समर्पण देख कर लोगों को उन पर भरोसा होने लगा।  और घेवर गांव में बने सबसे पहले जोहड़ ने एक सेतु का काम किया। कुंज बिहारी कहते हैं कि "पहले वर्ष में ही जोहड़ के पास के कुएं का जल स्तर 50 फीट ऊपर आ गया। इस वास्तविक प्रमाण के बाद हमें कुछ साबित करने की ज़रूरत नहीं थी। पानी ने सभी सामाजिक सीमाओं को लांघ लिया। समृधि के लिए लोग कोई भी शर्त पूरी करने को तैयार थे”।

समभाव ट्रस्ट नामक संस्था, जिसने उनके काम को प्रारंभिक तौर पर समर्थन दिया, इस बात को स्पष्ट तौर पर रखा कि समाज को भी अपना योगदान देना होगा। ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। इसलिए वे अपना 30 फीसदी योगदान श्रम के रूप में देते। धीरे-धीरे जब खेती में सुधार होने लगा तो पूरी जिम्मेदारी लोगों ने संभाल ली। आज यहाँ संस्था का कोई योगदान नहीं परन्तु जोहड़, एनिकट अभी भी बन रहे हैं।  

2015 के अकाल के बावजूद कुओं में पानी 40-50 फीट पर उपलब्ध है.

 

पारंपरिक प्रथाओं को किया जीवित

दोनों भाई बुजुर्गों के उस ज्ञान पर भी बहुत ज्यादा निर्भर थे जिन्हें समाज को पर्यावरण से जोड़ने वाली पूर्व में प्रचलित परंपराएं याद थीं। बुजुर्ग बताते हैं कि पहले के समय में लोग पूर्णिमा और अमावस्या वाले दिन खुद को सावर्जनिक कामों में स्वयंसेवक के तौर पर शामिल करते थे। इसमें जोहड़ों को मजबूत करना या वृक्षारोपण शामिल थे। जंगलों को इस्तेमाल के हिसाब से रेखांकित किया जाता था। अगर 'देव बनी' पवित्र वन क्षेत्र था, तो 'रखत बनी' सिर्फ अकाल के दिनों में इस्तेमाल किया जाता था। 'कांकड जंगल' दो गांवों की सीमा को रेखांकित करता और चारागाह में पशु चरते थे। 'धराड़ी प्रथा' में हर जाति किसी विशिष्ट पेड़ को पवित्र मानती थी । कुंज बिहारी कहते हैं कि "जैसे हमारी जाति की धराड़ी खेजड़ी का पेड़ है तो हम शुभ अवसरों पर इसकी पूजा करते है, इसके पौधे लगाते हैं और इस बात का ख्याल रखते हैं कि कोई इसे नुकसान न पहुंचाए।"

इन प्रथाओं के पुर्नजीवित होने से जंगल और गोचर भूमि का बचाव हुआ जिसने जल प्रवाह पर सकरात्मक असर डाला।

मिला प्रकृति का साथ

इन लोगों के प्रयास से ही विशेष वन संरक्षण समितियों का गठन भी हुआ जो नियमों का पालन न करने वालों पर जुर्माना लगाती हैं। इन प्रयासों को प्रकृति का साथ मिलना स्वाभाविक था। ज्यादातर राजस्व भूमि आज पेड़ों से घिरी है। पिपलवनी में सैकड़ों नए पीपल के पेड़ हैं जो गांव वालों ने बचाए हैं। कुंज बिहारी कहते हैं कि वृक्षारोपण की तुलना में चराई से सुरक्षा ने जंगल को बचाने में ज्यादा मदद की है। “अगर मनुष्य दखल न दे तो काम आसान हो जाता है। यह सब तभी संभव हो पाया जब ग्रामीणों ने वन, जल और आजीविका के बीच के संबंध को समझा और प्रकृति के साथ मिल कर काम करने को तैयार हुए।” पलायन न सिर्फ थमा बल्कि दूर दराज़ के किसान भी इस इलाके में जमीन खरीद कर या ठेके पर ले कर खेती कर रहे हैं। 

पारंपरिक प्रथाओं को पुनर्जीवित करने से जंगल का कटाव रुका.

 

रायका समुदाय को मिली आर्थिक मजबूतीः रायका समुदाय इस क्षेत्र की सबसे पिछड़ी जाति है। पारंपरिक तौर पर यह समुदाय ऊंटों का व्यापार करके जैसे-तैसे अपना गुजारा किया करता था। लेकिन आज इस इलाके के 15 रायका परिवारों के पास पक्के मकान और खेत हैं। 30 वर्षीय जय सिंह रायका कहते हैं कि उनकी जमीन पर कोई सिंचाई सुविधा नहीं थी, लेकिन पास में ही एक जोहड़ के बनने से उनके भी कुंए तर हो गए जिससे फसल अच्छी होने लगी।

हर ग्रामीण है इंजीनियर 

आज गांव वाले निर्माण से लेकर मरम्मत और वनों का संरक्षण अपने दम पर कर रहे हैं और कुंज बिहारी एक तकनीकी सहायक की तरह ज़रूरत पड़ने पर हाज़िर हो जाते हैं। वे बताते हैं कि हर कोई यहां एक इंजीनियर है। यह लोग न केवल पानी के सतही और धरातल के स्वभाव को समझते हैं, बल्कि निर्माण के सभी पहलुओं की जानकारी रखते हैं। यह ज्ञान सरकारी कामों की निगरानी में भी मदद करता है।

कुञ्ज बिहारी (दायें) एक किसान के साथ उनके खेत पर.

 

घेवर निवासी गजानंद शर्मा कहते हैं कि ‘कई बार ग्रामीण रोजगार योजना के तहत किया गया काम बुरी क्वालिटी का पाया गया। जब हमने उस पर आपत्ति जताई तो हमारे गांव के लिए काम का आवंटन बंद कर दिया गया।  लेकिन हम इस बात से संतुष्ट हैं कि हमारी दखलंदाजी से सरकारी पैसे को बर्बाद होने से बचाया जा सका’। उनकी सफलता की यह कहानी आज बहुत दूर निकल चुकी है। आज सतीश और कुंज बिहारी पास के क्षेत्रों के लोगों का मार्गदर्शन कर रहे हैं। जिस तरह से नदी के किनारे बसे लोग अपने ज्ञान से दूसरों को सशक्त कर रहे हैं उसी तरह से नांडूवाली नदी अपने प्रवाह में आने वाले खेतों और जीवों को पोषित कर रही है।

संपादन: वंदना गुप्ता 

इस लेख का अंग्रेजी रूपान्तर सबसे पहले इंडिया वाटर पोर्टल पर छपा था.

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